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संग्रह करना ठीक है, परंतु बांटने से ज़्यादा खुशी मिलती है : देवेंद्रसागरसूरिजी
January 10, 2020 • SANJAY JOSHIY • धार्मिक

बेंगलुरु। श्री पार्श्व सुशील धाम में रविवार, 12 जनवरी को आचार्यश्री देवेंद्रसागरजी की निश्रा में उनके जन्मदिन के निमित्त अक्किपेट जैन संघ के बालकों द्वारा प्रातः काल में जिनेंद्र अभिषेक का आयोजित किया जाएगा। आचार्यश्री देवेंद्रसागरजी ने शुक्रवार को अपने प्रवचन में कहा कि सर्वसाधारण रूप से व्यक्ति के दो चेहरे होते हैं। एक जो ईश्वर प्रदत्त है, दूसरा जो व्यक्ति स्वयं बना लेता है। हमारी जिंदगी में दोहरापन देखा जा सकता  है। मंदिरों में देवियों की पूजा, जिसे हम शक्ति आराधना कहते हैं, करते हैं, वहीं वास्तविक जीवन में महिलाओं की दशा से समाज वाकिफ है। भ्रूण परीक्षण, गर्भ में लड़कियों की हत्या जहां आम है और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में कन्याभोज का अपना महत्व होता है। आचार्यश्री बोले, परिवार सुनने में लगता अच्‍छा है, परंतु आज की इस भागदौड़भरी जिंदगी में माता-पिता के पास अपने बच्चों के लिए समय नहीं है। पारिवारिक सुख या आनंद लगता है, कहीं छिप गया है। तनाव के कुछ एक कारणों में यह सबसे प्रमुख है। परिवार खुशहाल होगा, यदि बच्चों की भावनाओं को समझें।  बचपन एक उपहार होता है। बचपन का संबंध कोमल भावनाओं से होता है। आदतन समय निकालकर बच्चों के साथ समय व्यतीत करें, जीवन की  खुशियां द्वार पर खड़ी इंतजार कर रही हैं। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। संग्रह करना ठीक है, परंतु बांटने से जो खुशी मिलती है, उसका आनंद ही कुछ और है। बांटना है, तो मुस्कान, देना है,  तो ऐसी राय जिससे खुशी मिले, मदद आर्थिक हो या शारीरिक। इतिहास साक्षी है, मोहल्ले का आनंद प्लेट में नहीं मिल सकता। अकेलापन मानव मन  और मानव शरीर को शिथिल बनाता है। प्रसन्नता सामूहिक हो तो जीवन में आनंद ही आनंद होता है। कभी नजर दौड़ाइए, आप पाएंगे कितना कुछ है  मिल-बांटने के लिए। 
 वे बोले तात्पर्य यह है कि मनुष्य जीवनपर्यंत ग्रहों, नक्षत्रों, ज्योतिष और अध्यात्म के फेर में स्वयं को भूल जाता है। हम ही शनि हैं। हम ही राहू हैं। हम ही  मंगल हैं। जीवन की वास्वविकता को अस्वीकार कर इन बातों को नियंत्रित करने की चेष्टा करते हैं, जो असंभव है। ग्रहों की गति को बदलना और इस  प्रकार अपने जीवन में परिवर्तन लाने की कोरी कल्पना हमें हताशा के अंधेरे में ढकेल रही हैं। हम स्वयं अपने आप में संपूर्ण हैं, जो ब्रह्मांड में हैं, वहीं  हम में भी हैं। उन्होंने कहा कि स्वयं को पहचानिए और बढ़ जाइए एक सुनहरे कल की ओर।