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मानवता का दीप जलाकर, शांति का पाठ पढ़ाएं : देवेंद्रसागरसूरिजी
December 27, 2019 • SANJAY JOSHI • धार्मिक


बेंगलुरु। यहां पार्श्व सुशील धाम में विराजित आचार्यश्री देवेंद्रसागरजी ने प्रवचन के माध्यम से श्रद्धालुओं को यह समझाने का प्रयत्न किया  कि किस प्रकार मानव और मानवता की रक्षा के लिए शांति की ज़रूरत है। मानवीय यूनिट से लेकर ग्लोबल स्तर तक आज शांति की जरुरत है। आज मानव मन शांति के लिए भटक रहा है। परमात्मा के पास पहुंचा हुआ भक्त परमात्मा रूपी दर्पण में अपने अंतस को निहारता है और उसमें जो दाग लगे हुए हैं उनको प्रक्षालित करता हैं। वह सुख-शांति का अनुभव करता हैं। शांति बाहर नही अपने अंदर है। भौतिक संसाधनों में शांति नहीं हैं। शांति कैसे प्राप्त हो इसके लिए शांति के साधनों को अपनाना होगा। उन्होंने कहा कि शांति के लिए मानवता का विकास जरूरी हैं। मानव के अंदर जब तक मानवीयता का दीप नहीं जलेगा तब तक शांत की अनुभूति आप कर नहीं सकते। आप घर-घर में अशांति, समाज, गांव, नगर, देश, राष्ट्र में अशांति है उसका मूल कारण मानवीय गुणों का अभाव हैं। दया, करूणा, वात्सल्य अगर परस्पर में है तो कभी बैर भाव की ग्रन्थियां नहीं बधेंगी और अगर प्रेम, वात्सल्य नहीं हैं तो कोई भी बात होने पर आप तुरंत आवेश में आकर अपनी तथा परिवार की शांति भंग कर देते हैं। आचार्यश्री ने कहा, आज आवश्यकता है राम-लक्ष्मण-सीता के आदर्शों को अपनाने की। आप रामायण सीरियल कथा आदि देख चुके हैं पर उनके आदर्शों को आप अपनाने का प्रयास नहीं करते। घर-घर में अगर राम – लक्ष्मण और सीता जैसे सदस्य होंगे तो निश्चित शांति का का प्रश्न हल हो सकता हैं। आप अगर दूसरों का कष्ट दूर करते हैं, दूसरों की पीड़ा हरते हो तो आप स्वयं अपने आप में सुखद अनुभव करते है और आप किसी को कष्ट पहुंचाते हैं, कटुवचन बोलते हो तो मन की प्रशस्तता आपकी उस समय छिन जाती है।
स्वभाव की ओर आने में शांति है विभाव की ओर जाने में अशांति हैं। अहिंसा स्वभाव है और हिंसा विभाव हैं। अत: स्वभाव को आप अपनायें विभाव को ठुकराये तभी शांति आपको मिल सकती हैं। शांति के लिये दृष्टिकोण साफ करनें की आवश्यकता है।
आज व्यक्ति की दृष्टि साफ नहीं रही फलस्वरूप अशांति उसके द्वार पर दस्तक देती है। अगर आपके अंदर छोटे बड़ों के प्रति, अपने बच्चों व देवरानी के बच्चों के प्रति भेद है तो घर में परस्पर में लड़ाई आरम्भ हो जाती है। सभी के प्रति अगर आपकी समान दृष्टि है तो परस्पर में प्रेम वात्सल्य रहेगा। दृष्टिकोण को साफ करने के लिए स्वावलंबन, पुरूषार्थ तथा स्वतंत्रता जरूरी हैं।