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बच्चों में संस्कारों का विकास अपने से बड़ों को देखकर ही होता है : आचार्य देवेन्द्रसागरजी
January 17, 2020 • SANJAY JOSHIY • धार्मिक

बेंगलूरु। बच्चों में संस्कारों का विकास हमेशा अपने से बड़ों को देखकर ही होता है इसलिए अपने आचरण को सही रखना भी उतना ही जरूरी है जितना बच्चे पर ध्यान देना। कहते हैं न 'अगर ठीक से खाद डाली जाए, तो पौधा बहुत सुंदर होता है' और संस्कार उसी खाद का काम करते हैं। उक्त बातें आचार्य श्री देवेंद्रसागरजी ने सुशील धाम में आयोजित संस्कारदान महादान शिविर के तहत आए हुए माता पिता (अभिभावकों) को संबोधित करते हुए कही। वे बोले, आपाधापी वाले समय में हम कुछ सोचें अपने बच्चों के बारे में, उनकी परवरिश के बारे में। अक्सर देखा गया है कि किसी बच्चे की खराब आदतों को देखकर लोग फब्तियां कसते हैं कि इस बच्चे को अच्छे संस्कार नहीं मिले। उन्होंने कहा कि जब बच्चा चीजों को जानने और समझने लगता है तभी से उसमें आदतों को विकास शुरू हो जाता है। ऐसे में इस बात का ध्यान जरूर रखा जाए कि कहीं लाड़-प्यार में आप अपने बच्चों को संस्कारों से दूर तो नहीं कर रहे। लोग अपने बच्चों को हर चीज उपलब्ध करवाने की जिद में उनकी हर जायज व नाजायज मांग को पूरा कर देते हैं, जिससे उनमें हर कीमत पर कुछ भी पाने की प्रवृत्ति का विकास होता है। ऐसा करते समय माता-पिता यह नहीं सोचते कि वे अपने बच्चे को सिर्फ लेना सिखा रहे हैं, देना नहीं। आचार्यश्री ने आगे कहा कि अपने बच्चों की गतिविधियों पर नजर रखें। तकनीक में घुल रहे बचपन से आज के बच्चे सारे काम अंगुलियों के इशारे पर करते हैं मसलन प्लेयर पर गाने सुनना, कम्प्यूटर पर गेम खेलना, टीवी देखना, फेसबुक चलाना, व्हाट्‍स ऐप आदि। आजकल तो बच्चों का सारा समय इंटरनेट पर ही गुजरता है। वे नहीं समझते क्या गलत है और क्या सही। वे तो वही सीखते हैं जो उन्हें दिखाई देता है। इसलिए बच्चों के हाथ में तकनीकी खिलौना देने के साथ ही समझाइश भी बहुत जरूरी है। अंत में आचार्यश्री बोले, सबसे महत्वपूर्ण है अपने बच्चे को समझना और उसके नजरिए से चीजों को देखना। अपने बच्चों से उनके काम, दोस्तों आदि के बारे में हमेशा बातें करते रहें। कम्युनिकेशन गेप सारी चीजें खराब कर सकता है। जब आप उनके नजरिए से चीजों को देखेंगे तभी उनकी भाषा में उन्हें समझा पाएंगे।